भारतीय आर्मी की वो घोस्‍ट रेजीमेंट, जिसने 1971में छुड़ा दिए थे पाकिस्तान के छक्के 

 
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भारतीय आर्मी की घोस्‍ट रेजीमेंट के बारे में आपने सुना होगा. यह रेजिमेंट हमेशा गुम सी रहती है. लेकिन इस रेजीमेंट की तारीफ खुद दुश्मन भी करता है. इस रेजीमेंट के पास मौजूदा समय में सबसे ज्यादा बैटल और थियेटर ऑनर्स हैं. हम सेना की 63 कैवलरी रेजीमेंट की बात कर रहे हैं जिसने पाकिस्तान के खिलाफ 1971 में हुए युद्ध में हिस्सा लिया था.

63 कैवलरी रेजीमेंट को पूना हॉर्स के रूप में भी जाना जाता है. पाकिस्तानियों को इस रेजीमेंट के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था और वह इतने कंफ्यूज थे कि उन्होंने इसे खलाई मखलूक नाम दिया था. उर्दू में इसे एलियन या स्‍पेस का प्राणी समझा जाता है. उस समय इस रेजिमेंट की अगुवाई लेफ्टिनेंट जनरल हनौत सिंह ने की थी. जनरल हनौत सिंह को पाकिस्तान की तरफ से फख्र-ए-हिंद जैसा सम्मान दिया गया था. 

भारतीय सेना ने 1971 की जंग में ईस्ट पाकिस्तान यानी बांग्लादेश को चारों तरफ से घेर लिया था. भारतीय सेना ने आक्रामक रुख अख्तियार कर रखा था. 63 कैवलरी के पास टी-55 मीडियम टैंक्‍स की स्‍क्‍वाड्रन थी और इन्‍हें ऑपरेशन के पहले ही शामिल किया गया था. इस रणनीति का नतीजा था कि जेसोर पर भारत का कब्‍जा हो गया था. 

63 कैवलरी ने टी-55 की दो स्‍क्‍वाड्रन के साथ उत्तर में मोर्चा संभाला था. इस रेजिमेंट के साथ पीटी-76 एम्‍फीबीशियस टैंक्‍स भी थे. युद्ध के अंतिम चरण में यह रेजीमेंट डेका में दाखिल हुई थी, जिसके बाद दुश्मन को कुछ भी समझ नहीं आया और इसी वजह से इसे घोस्ट रेजीमेंट नाम दे दिया गया. नतीजा यह रहा कि 14 और 15 दिसंबर 1971 को भारत युद्ध के निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया.

बता दें कि इस रेजीमेंट को 1971 में युद्ध में वीरता का प्रदर्शन करने की वजह से 8 गैलेंट्री अवॉर्ड्स से सम्मानित किया गया था. इस रेजिमेंट की स्थापना 2 जनवरी 1957 को राजस्थान के अलवर में हुई थी. इसके पहले कमांडिंग ऑफिसर ले. कर्नल हरमिंदर सिंह थे जो बाद में ब्रिगेडियर की रैंक से रिटायर हुए थे. 

इस रेजीमेंट ने 1963 से 1971 के बीच मिजो हिल्‍स, नागा हिल्‍स, मणिपुर और त्रिपुरा में चलाए गए इनसर्जेंसी ऑपरेशंस में हिस्‍सा लिया था. इतना ही नहीं जनवरी 1993 से अप्रैल 1996 तक पंजाब में एंटी-टेररिस्‍ट ऑपरेशंस में भी इस रेजीमेंट ने बड़ी भूमिका अदा की थी.

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