यह है दुनिया के वह देश जो साल में 2 बार बदलते हैं अपनी घड़ी का समय

दुनियाभर में ऐसे कई सारे देश है जो साल में 2 बार घड़ी के समय को सेट करते हैं। यानी उन देशों में घड़ी का समय करीब एक घंटा आगे पीछे हो जाता है। आपको बता दें कि इस सिस्टम को डेलाइट सेविंग टाइम के तौर पर समझा जाता है। वैसे तो इसकव समझना कोई
 
यह है दुनिया के वह देश जो साल में 2 बार बदलते हैं अपनी घड़ी का समय

दुनियाभर में ऐसे कई सारे देश है जो साल में 2 बार घड़ी के समय को सेट करते हैं। यानी उन देशों में घड़ी का समय करीब एक घंटा आगे पीछे हो जाता है। आपको बता दें कि इस सिस्टम को डेलाइट सेविंग टाइम के तौर पर समझा जाता है। वैसे तो इसकव समझना कोई पहेली नहीं है। अमेरिका समेत दुनिया के कई अन्य देशों में साल के 18 महीनों के लिए घर में घड़ी आगे चलती है। और बाकी 4 महीने वापस 1 घंटे पीछे कर दी जाती है। मार्च के दूसरे रविवार को अमेरिका में घड़ियों को एक घंटा आगे कर दिया जाता है। आज हम आपको इसके पीछे के कारणों के बारे में बताते हैं।

यह है दुनिया के वह देश जो साल में 2 बार बदलते हैं अपनी घड़ी का समय

पुराने समय में माना जाता था कि इस प्रक्रिया से दिन की रोशनी का अधिक से अधिक इस्तेमाल के कारण किसानों को अतिरिक्त कार्य समय मिल जाता है। लेकिन समय के साथ ही धारणा बदल गई। अब सिस्टम को बिजली की खपत कम करने के मकसद से अपनाया जाता है। यानी गर्मी के मौसम में घड़ी को एक घंटा पीछे करने से रोशनी का अधिक इस्तेमाल के लिए मानसिक तौर पर एक घंटा अधिक मिलने का कांसेप्ट है।

दुनिया के करीब 70 देश इस सिस्टम को अपनाते हैं। हालांकि भारत और अधिकांश मुस्लिम देशों में यह प्रैक्टिस नहीं अपनाई जाती है।

हालाकिं इस सिस्टम को अपनाने के पीछे वजह यह थी कि इससे खपत कुछ कम हो। लेकिन अलग-अलग अध्ययनों में अलग-अलग आंकड़े दे चुके हैं। इसलिए इस सिस्टम को लेकर हमेशा बहस चलती रहती है। उदाहरण के लिए साल 2008 में अमेरिकी एनर्जी विभाग ने कहा था कि इस सिस्टम के लिए करीब 0.5 पीसीसी की खपत हुई लेकिन आर्थिक रिसर्च के नेशनल ब्यूरो ने इस विशाल स्टडी में कहा है कि इस सिस्टम के कारण बिजली की डिमांड बढ़ गई है।

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