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सुखी जीवन का मंत्र; जो लोग हमेशा असंतुष्ट रहते हैं, वे हमेशा अशांत दुःखी होते हैं, हमारे पास जितना धन और सुख-सुविधाएं है हमें उसमें ही खुश रहना चाहिए

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जो व्यक्ति अपनी चीजों से हमेशा संतुष्ट रहता है। वह सदा सुखी माना जाता है अगर कोई व्यक्ति बहुत जल्दी से दूसरों की तरफ आकर्षित होता है। तो वह व्यक्ति हमेशा दुखी होता है। क्योंकि वह अपनी सुख-सुविधाओं का आनंद ही नहीं ले पाता और सुखी नहीं हो पाता। हालांकि यह बात आज हम आपको लोककथा के द्वारा समझाएंगे तो चलिए आपको बताते हैं।

एक लोक कथा के मुताबिक पुराने समय में एक राजा अपने जन्मदिन पर बहुत ही ज्यादा प्रसन्न था। उसने सोचा कि आज मैं एक व्यक्ति की सभी इच्छाओं को पूर्ण करूँगा। हालांकि राजा ने अपने जन्मदिन के उपलक्ष में दरबार के अंदर बड़ा सा आयोजन किया। प्रजा अपने राजा के जन्मदिन पर शामिल होने के लिए उनके दरबार भी पहुंची। प्रजा के साथ एक संत भी वहां पर मौजूद थे संत ने राजा को जन्मदिन की बधाइयां दी राजा ने संत से कहा कि गुरुदेव आज मैं आपकी सभी इच्छाओं को पूरा करना चाहता हूं। आप आज के दिन मुझसे कुछ भी मांग सकते हैं। संत ने राजा से कहा महाराज मुझे आपसे कुछ भी नहीं चाहिए।

राजा ने संत से फिर कहा कि गुरुदेव मेरे लिए कोई भी काम असंभव नहीं है। आप अपनी इच्छाओं को मुझे बताएं मैं उन्हें जरूर पूरा करूंगा। हालांकि राजा लगातार जिद कर रहा था तो संत ने कहा ठीक है राजा मेरे पात्र को कृपया करके आप स्वर्ण मुद्राओं यानी कि सोने की मुद्राओं से भर दीजिए।

राजा ने संत की बात सुनी और कहा बस इतना सा काम मैं अभी इसको भर देता हूं। राजा ने जैसे ही अपने पास रखी हुई मुद्राएं उसमें डाली तो सभी मुद्राएं गायब होने लगी। राजा इन सबको देखकर हैरान हो गया राजा ने अपने कोषाध्यक्ष को बुलाकर खजाने और स्वर्ण मुद्रा मंगवाई। राजा जैसे जैसे उस बर्तन में मुद्राएं डालता जा रहा था वह अपने आप ही गायब होती जा रही थी। ऐसे करते-करते धीरे धीरे राजा का पूरा खजाना ही खाली हो गया लेकिन वह बर्तन भरने का नाम ही नहीं लिया।

हालांकि इन सबके पास राजा यह सोचने लगा कि यह तो कोई ज्यादा ही पात्र है। जिस वजह से मैं बार-बार इसमें खजाना डाल रहा हूं और वह गायब हो रहा है राजा ने संता से पूछा किस बर्तन का आखिर क्या रहस्य है। मेरा पूरा खजाना खाली हो गया लेकिन यह भारी नहीं पाया तो संत ने कहा कि महाराज यह पात्र इंसान के मन का प्रतीक है। जिस तरह हमारा मन धन ज्ञान कभी नहीं भरता। उसी तरह से यह कैसा पात्र है जिसमें आप कितना भी सोना डाल लीजिए यह कभी नहीं भरेगा।

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संत ने अपनी बात को बढ़ाते हुए कहा कि जब तक हमारे मन में भक्ति की भावना नहीं आती। तब तक यह खाली ही रहता है इसलिए व्यक्ति को संसार एक मोहमाया को छोड़कर भगवान में लीन हो जाना चाहिए क्योंकि हमारी सभी इच्छाएं अनंत है। जो कभी भी पूरी ही नहीं हो सकते इसलिए हम जिस स्थिति में है उसी में प्रसन्न रहें यही एक सुखी जीवन का मंत्र होता है।

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