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ऐसे लोगों पर कभी नहीं होती ईश्‍वर की कृपा, इसलिए जरा सभल कर !

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दुनिया में हर व्यक्ति खुश रहना चाहता है। लेकिन वह बनावटी और असली आनंद में अंतर नहीं कर पाता है। जिसे वह असली समझता है जैसे भौतिक सुख कुछ समय बाद उसे समझ आता है कि उसके पीछे वो जीवनभर भागता रहा है। वह तो नकली था, या भ्रम था। असली खुशी तो प्रभु भक्ति में ही है लेकिन जब तक वह यह समझ पाता है तब तक उसके जीवन का अधिकतर समय निकल चुका होता है। ईश्वर की असली प्रार्थना का सार सत्य में छुपा होता है सत्य के बिना हम भगवान को प्राप्त नहीं कर सकते। क्योंकि साथ ही भगवान है इसके माध्यम से हम परमपिता परमेश्वर को अनुभव तो कर सकते हैं। और परमानंद की प्राप्ति कर सकते हैं

साधना में लीन होकर ही ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। जिसे इंसान मैं काम क्रोध मद लोभ और मोह होता है। वह कभी भी ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता हमारा कर्म करना तो ठीक है। लेकिन कर्म करने के साथ व्यक्ति का भाव होना परम आवश्यक है। सभी भक्तों कर्म सार्थक हो जाता है प्रार्थना करने वाले इस दुनिया में रहे। लेकिन उनके मन में मोह माया बिल्कुल भी नहीं होनी चाहिए। मुताबिक खुशी मजे से अलग होती है। मजा तो किसी वस्तु कारण यह घटना होने पर आता है। जबकि खुशी किसी वस्तु या कारण पर निर्भर नहीं होती। यह तो शर्त के साथ, नियमबद्ध होती है। यह भाव और सत्व की एक अवस्था होती है, जो आपके अंदर से आती है। यह तब आती है। जब कुछ प्राप्त करने की इच्छा नहीं रहती है बल्कि जो हमारे पास है हम उसके लिए कृतज्ञ होते हैं। उल्लास के लिए हमें अपने आपको पूर्ण रूप से परिवर्तित या रूपांतरित करना चाहिए। हमारा उद्देश्य परमानंद होना चाहिए।

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