Loading...

खुफिया कोड बताने वाला ‘भूतिया’ रेडियो स्टेशन, आज भी आती है अजीब-अजीब सी आवाज़ें

0 14

जासूसी करने की भी अजीब-अजीब तरीके होते हैं। खुफिया कोड, बनावटी बातें, खास जबान, चेहरे पर चेहरा, हनीट्रैप वगैरह वगैरह…। कुल मिलाकर खुफिया जासूसी आमतौर पर लोगों की नजरें बचाकर छुपछुपा कर की जाती है। ताकि दुश्मन की नजर ना पड़े। कोई इस बात को जान भी ना पाए लेकिन आपने कभी नहीं सुना होगा कि कोई देश रेडियो स्टेशन से जासूसी करता है और वह भी खुलेआम। जी हां चलिए आज हम आपको एक ऐसा ही रेडियो स्टेशन का किस्सा सुनाते हैं।

यह रेडियो स्टेशन रूस के सेंट पीटर्स वर्ग शहर से कुछ दूर सुनसान जिले में है। वीडियो स्टेशन से नियमित अंतराल पर कुछ प्रसारित होता है इसके बाद जैसे ही किसी रेडियो स्टेशन से प्रसारण बंद हो जाता है। ठीक उसी तरह इस स्टेशन से विभिन्न भुनभुनाहट की आवाज सुनाई देती है इस रेडियो स्टेशन का ऐसा अजीबोगरीब प्रसारण पिछले कई दशकों से लगातार जारी है। इन सबके बीच में दिलचस्प बात यह है कि दुनिया भर में यह रेलवे स्टेशन सुना जाता है।

किसी को भी इस बात का नहीं पता कि यह रेडियो स्टेशन कौन चला रहा है। किसी भी रिकॉर्ड में इस स्टेशन का नाम नहीं है। रूस की सरकार इसकी मौजूदगी से अंजान बनती है। अब ऐसे रहस्यमई स्टेशन के बारे में अजीबोगरीब चीजें तय होना बेहद आम बात है। इस रेडियो स्टेशन का नाम है। MDZhB। पश्चिमी देशों में इसे ‘द बजर’ के नाम से जाना जाता है। इसलिए करीब 35 सालों से यह स्टेशन विचित्र आवाज दुनियाभर को सुना रहा है। लेकिन अब तक कोई भी इसको डिकोड नहीं कर पाया है।

इस रेडियो स्टेशन पर दुनिया की नजर पड़ने की वजह एक अजीब सा रूटीन है। हफ्ते में एक या दो बार कोई मर्द या औरत इस स्टेशन पर कुछ शब्द बोलते हैं, जैसे कि डिंगी या किसानी के विशेषज्ञ। बस इसके बाद रेडियो स्टेशन की फ्रीक्वेंसी पर वही भन-भन की आहट आवाज सुनाई देती है। यह रेडियो स्टेशन शॉर्ट वेब पर प्रसारित होता है। इसी वजह से यह दुनिया भर में सुना जाता है। इस रेडियो स्टेशन के अजीब प्रसारण की वजह से ही इस से लेकर तमाम तरह के किस्से कहानियां देश भर में प्रचलित है। इस तरह के दो और रेडियो स्टेशन है। ऐसे ही अजीबोगरीब सुनने के शौकीन लोग इन्हें दा पिप के नाम से बुलाते हैं।

Loading...

ऑनलाइन दुनिया में इस तरह के इन तरह के रहस्यमयी रेडियो स्टेशनों के तमाम चाहने वाले हैं। वो नियमित रूप से इनका प्रसारण या इनकी भनभनाहट सुनते हैं। लंदन की सिटी यूनिवर्सिटी के सिग्नल स्पेशलिस्ट डेविड स्टपल्स कहते कि रेडियो स्टेशनों का मकसद अब तक डिकोड नहीं हो सका। रेडियो स्टेशन की फ्रीक्वेंसी की बुनियाद पर पश्चिमी देश ये मानते हैं कि ये रूसी सेना से ताल्लुक रखता है। इसका प्रसारण शीत युद्ध के आखिरी दिनों में शुरू हुआ था। आज रेडियो स्टेशन का प्रसारण सेंट पीटर्सबर्ग और मास्को से होता है सोवियत संघ के विघटन के बाद रेडियो प्रसारण में कमी आने से बहुत तेजी आ गई है।

सोवियत संघ के जमाने से एक ऐसा सिस्टम विकसित किया गया था। जिसमें कंप्यूटर हवा में तरंगें सुनी जाती थीं। ये तरंगें धरती से बाहर दुनिया की तलाश करती थीं। या फिर एटमी हमले की सूरत में देश को एलर्ट करने के काम आती थीं। पश्चिमी देशों के जानकार मानते हैं कि सोवियत संघ के जमाने की यह तकनीक रूस आज भी इस्तेमाल कर रहा है रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने कहा था कि एटमी जंग की सूरत कोई भी नहीं बचेगा तो क्या द बंजर उस पर परमाणु हमले की सूरत में अपनी एजेंसियों को पलटवार का फरमान देने के लिए चलाया जा रहा है।

Loading...

Leave A Reply

Your email address will not be published.