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इन 5 मंदिरों में भगवान की नहीं बल्कि दैत्य और राक्षसों की भी की जाती है पूजा

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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार पृथ्वी पर कई ऐसे असुर थे, जो ऋषि-मुनियों देवताओं और मनुष्य के लिए कई बार समस्या खड़ी कर देते थे. ऐसे में सभी को परेशानियों से बचाने के लिए देवी देवता विभिन्न रूपों में अवतार लेकर इन का वध करते थे. इसी आधार पर आज सुख शांति और विश्व में धर्म की स्थापना है.

देवी देवताओं ने पृथ्वी को राक्षसों से बचाया था इस कारण आज हम उनकी पूजा करते हैं. लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी और भारत में कुछ ऐसी जगह भी है, जहां पर देवताओं नहीं बल्कि असुरों के मंदिर हैं. इन मंदिरों में इन राक्षसों की पूजा की जाती है. आइए जानते हैं इन आसुरी मंदिरों के बारे में.

पुतना का मंदिर (गोकुल, उत्तरप्रदेश) -: भगवान कृष्ण के अवतार के समय इस राक्षसी का वर्णन मिलता है. कहा जाता है कि पूतना भगवान श्री कृष्ण को मारने के उद्देश्य से गोकुल आइ थी. भगवान कृष्ण की मां बन के पूतना ने भगवान को जहरीला दूध पिलाया था, इसलिए पूतना को यहां एक मां के रूप में माना जाता है. इस मंदिर में पूतना कि लेटी हुई मूर्ति बनी हुई है, जिसके स्तनों से भगवान कृष्ण दूध पी रहे हैं.

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कंस मंदिर (लखनऊ, उत्तरप्रदेश) -: कृष्ण अवतार के समय का सबसे बड़ा दुष्ट राक्षस कंश था, पर लखनऊ से कुछ दूर ही पर हरदोई नामक स्थान पर इस राक्षस का मंदिर है. यहाँ पर कृष्ण के मामा राजा कंस की बड़ी सी मूर्ति है, जिसकी नियमित रूप से पूजा-पाठ की जाती है.

अहिरावण मंदिर (झांसी, उत्तरप्रदेश) -: रामायण काल के समय इस राक्षस का वर्णन मिलता है. अहिरावण ने राम रावण युद्ध के समय लक्ष्मण और भगवान राम का अपहरण कर लिया था. कहा जाता है कि यह राक्षस भगवान को पाताल लोक में ले गया था, जहां से भगवान राम के सेवक हनुमान जी ने इनको छुड़ाया था. इस राक्षस का मंदिर झांसी के पंचकूला में भगवान हनुमान जी के साथ ही स्थित है. 300 साल पुराने इस मंदिर में अहिरावण और उसके भाई महिरावण की पूजा की जाती है.

दुर्योधन मंदिर (नेटवार, उत्तराखंड) -: महाभारत युद्ध का प्रमुख कारण दुर्योधन था, लेकिन फिर भी उत्तराखंड की नेटवार नामक जगह से लगभग 12 किलोमीटर दूर दुर्योधन की देवता की तरह पूजा की जाती है. दुर्योधन मंदिर के पास ही उसके परम मित्र हर कर्ण का मंदिर बना हुआ है. इस मंदिर में हर साल दूर-दूर से कई लोग धोक लगाने आते हैं.

दशानन मंदिर (कानपुर, उत्तरप्रदेश) -: रामायण काल का असुर राज रावण था. इस राक्षस की हत्या करके भगवान राम ने पृथ्वी को पाप मुक्त करवाया था, पर उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर के शिवाला इलाके में रावण की देवता की तरह पूजा की जाती है. रावण के इस मंदिर का निर्माण 1890 में हुआ था. इस इलाके में लोग रावण को शक्ति का प्रतीक मानते हैं और उसकी पूजा करते हैं.

हालांकि रावण का यह मंदिर साल में केवल दशहरे के दिन भी खुलता है. दशहरे के दिन रावण की मूर्ति का श्रृंगार, पूजा पाठ किया जाता है. दशहरे की शाम को एक बार फिर से रावण के मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं और अगले दशहरे तक मंदिर बंद रहता है.

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1 Comment
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