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क्या आप जानते हैं कि भारत में सोना कहां और कैसे निकाला जाता है, अगर नहीं तो आज जान लीजिए

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प्राचीन काल में हमारा भारत देश सोने की चिड़िया कहा जाता था. आज भी हमारे देश में कई जगह भरपूर मात्रा में सोना निकलता है. कर्नाटक राज्य भारत में सबसे ज्यादा सोने का उत्पादन करता है. कर्नाटक में कोलार, हुट्टी और पुट्टी नाम की खाने मौजूद है, जिनमें से सोना निकाला जाता है. भारत में कर्नाटक के अलावा आंध्र प्रदेश और झारखंड में भी सोना निकाला जाता है. सोना ज्यादातर पार, सिल्वर, कैलेवराइट, सिल्वेनाइट, पेटजाइट और क्रेनराइट के अयस्को के रूप में पाया जाता है.

ज्यादातर सोना अंडर ग्राउंड खानो या खुले से आता है. आपको जानकर हैरानी होगी लेकिन तकरीबन 1 टन पत्थर से लगभग 4 ग्राम सोना ही निकलता है. झारखंड की एक खदान हर साल करीब 7 किलो सोने का उत्पादन करती है.

सोना निकालने से पहले 7 तरह की प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है. जिनमें से तीन रासायनिक प्रक्रिया होती है और चार इंसानों द्वारा की जाने वाली प्रक्रिया. उसके बाद कहीं जाकर सोना निकलता है.

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सबसे पहले भूविज्ञान जांच करके बताते हैं कि किस पत्थर में स्वर्णअयस्क हो सकते हैं. जब इस बात का पता चलता है तो डायनामाइट की मदद से चट्टान को तोड़कर 300 से 500 मीटर की गहराई से करीब 1 टन पत्थर निकाला जाता है. इस तरह 1 दिन में तकरीबन 300 टन मलबा बाहर निकाला जाता है. स्वर्ण अयस्क मूव करते रहते है इसलिए सोना एक जगह पर जमा हुआ नहीं मिलता है.

चट्टानों से निकाले गए मलबे को मशीनों की सहायता से तकरीबन 4-5 घंटे में पीस लिया जाता है. इतनी देर में यह मलबा बालु में बदल जाता है.

इस बालू में पानी मिलाकर इसको लिक्विड की तरह तैयार करते हैं. इस लिक्विड को एक वाइब्रेटिंग टेबल पर बिछे कंबल पर डालते हैं. जब बालू को कंबल पर डालते हैं तो गीले कण इसमें से गुजरते हैं. जिनमें से सोने के कण चिपक जाते हैं और बेकार पत्थर निकल जाते हैं. यह प्रक्रिया कई बार दोहराई जाती है.

जब सोने के कण कंबल से चिपक जाते हैं तो उस कंबल को पानी में धोते हैं. पानी में धोने पर कंबल से सोने के कण अलग होकर पानी में मिश्रित हो जाते हैं. इस पानी को टेबल पर डाला जाता है ,जहां से सोने के कण टेबल पर रह जाते हैं और पानी बह जाता है. जमा हुए सोने से बिस्किट, ईंट, प्लेट आदि सामान बनाया जाता है.

सायनाइड की प्रक्रिया – निकाले गए अयस्क में अगर सोने की मात्रा कम होती है, तो साइनाइड की रासायनिक प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाता है. इस प्रक्रिया में निकाले गए पत्थर और इसके चूर्ण को साइनाइड में मिलाकर कार्बन Plus प्लांट में 48 घंटे तक प्रोसेस करते हैं. 50 घंटे बाद मलबे में छिपा हुआ सोना तरल रूप में बाहर आ जाता है.

अमलगमेशन – जब स्वर्ण अयस्क निकलता है तो उससे शुद्ध सोना प्राप्त करने के लिए अमलगमेशन विधि का प्रयोग किया जाता है. इस विधि में सबसे पहले सोने के कणों को धोकर छोटे-छोटे कणों में पीसा जाता है. इन छोटे कणों को पारे की परत चढ़ी हुई प्लेटो से गुजारा जाता है. जब यह स्वर्ण कण पारे से मिलते हैं, तो अमलगम बना देते हैं. अमलगम बनने के बाद इसको तब तक गर्म किया जाता है जब तक कि पारा गैस बन कर उड़ नहीं जाता है. इस प्रक्रिया में अत्यधिक सावधानी की जरूरत होती है क्योंकि पारे से बनी गैस जहरीली होती है. जब पारा गैस के रूप में उड़ जाता है, तो सोना बच जाता है.

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