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मंदिर में चढ़ाए जाने वाले फूलों की सुगंध से महक रहे हैं घर, महिलाओं को भी मिला रोजगार

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भगवान को चढ़ाए जाने वाले फूलों को बाद में नदी तालाबों में बहा दिया जाता है, जिस वजह से जल स्रोत गंदे होते हैं. लेकिन कानपुर के अपूर्व मिसाल, अंकित अग्रवाल और उनकी टीम ने 2017 में फूलों को बटोरकर रीसाईकिल कर अगरबत्ती और धूपबत्ती बनाई. इस टीम ने 2 किलो फूलों से स्टार्ट अप शुरू किया और 2 साल बाद अब सालाना 8.50 टन फूलों का कलेक्शन कर रही है. इन फूलों से धूप और अगरबत्ती बनाई जा रही है, जिससे 80 महिलाओं को रोजगार मिला.

आइडिया गंगा किनारे आया था

अपूर्व ने बताया कि यह बिजनेस करने का विचार स्टार्टअप के फाउंडर अंकित अग्रवाल के मन में आया था, जब वह अपने मित्र के साथ कानपुर में गंगा नदी के किनारे बैठे हुए थे तो उन्होंने गंगा के तट और नदी में पड़े फूलों को देखा. उन्होंने सोचा कि हमें इन अनुपयोगी फूलों का उपयोग करना चाहिए. हमने लोगों से इस बारे में बात की. हम शुरुआत में एक मंदिर में गए और अपनी इच्छा बताई. जब मंदिर के पुजारी और अन्य लोगों को बताया कि वे क्यों इन फूलों को ले जा रहे हैं. उन्होंने पहले दिन 2 किलो फूल जुटाए.

2 महीने की रिसर्च, 2 किलो फूल और 72000 का निवेश

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अंकित की टीम ने इन फूलों को लेकर 2 महीने तक रिसर्च किया, जिसके बाद पता चला कि इनसे अगरबत्ती बन सकती है. 2 किलो फूल और 72000 रुपए का निवेश करने के बाद स्टार्टअप सालाना 8.50 टन का कलेक्शन अगरबत्ती बनाने का काम कर रहा है.

रिसर्च सफल होने के बाद आईआईटी के छात्र से ली मदद

जब यह प्रक्रिया पूरी हो गई तो उन्होंने आईआईटी कानपुर से एमटेक, बीटेक करने वाले छात्रों से मदद ली. कुछ प्रोफेसर भी इस काम में उनके साथ जुड़े. उन्होंने सबसे पहले रिसर्च टीम को खड़ा किया, जिसके बाद फैक्ट्री शुरू करने की योजना बनाई.

शुरुआत में 10 लोगों की टीम थी

अपूर्व ने बताया कि शुरुआती दौर में हमारे साथ दो तीन महिलाएं जुड़ी. सभी लोगों को मिलाकर कुल 10 लोगों की टीम थी. लेकिन आज हमारे साथ 80 महिलाएं काम कर रही है. हमारी टीम में 15 सदस्य हैं. हमारी फैक्ट्री से बनने वाले प्रोडक्ट अब भारत के अलावा विदेशों में भी जा रहे हैं. हमारे उत्पाद यूएसए और सिंगापुर में भी बिक रहे हैं.

देश के बड़े शहरों में जाने की योजना

अपूर्व ने कहा कि हमने योजना बनाई है कि हम ऐसे ही बड़े शहरों में जाएंगे, जहां फूलों का इस्तेमाल ज्यादा होता है. हम जल्द ही तिरुपति, अयोध्या और द्वारकाधीश में भी प्लांट लगाने की सोच रहे हैं. उन्होंने यह बताया कि शुरुआत में लोगों को समझाना बहुत मुश्किल था कि हमें फूलों का क्या करेंगे. इससे क्या फायदा होगा. लेकिन अभी समस्या खत्म हो चुकी है. कई मंदिर और संस्थाएं इस मामले में हमारी मदद कर रहे हैं.

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