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सरकार अब बनाएगी मेंस्ट्रूअल कप और बायॉडिग्रेडिबल सैनिटरी नैपकिन, ये है योजना

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महिला सशक्तिकरण की मुहिम को आगे बढ़ाते हुए अब केंद्र की मोदी सरकार महिलाओं के लिए मेंस्ट्रुअल कप और नैपकिन बनाने की योजना पर काम करेगी। जी हां, दरअसल महिलाओं/लड़कियों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए मेंस्ट्रुअल हाइजीन स्कीम के तहत सरकार आक्सी बायोडिग्रेडेबल सैनेटरी नैपकिन और मेंस्ट्रुअल कप बनाएगी। इसके लिए सरकार की हेल्थ टीम रिसर्च कर रही है।

आपको बता दें कि यह जानकारी स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से संसद में दी गई है। दरअसल नैपकिन में प्लास्टिक मिला होता है, इसलिए इसे डिकंपोज होने में 500-800 साल लगते हैं। यही कारण है कि ये नैपकिन सेहत के साथ पर्यावरण के लिए भी नुकसानदेह है इसलिए सरकार की योजना बायॉडिग्रेडिबल नैपकिन बनाने की है।

सरकारी स्कूलों में लगेगी सैनेटरी पैड वेंडिंग मशीनें

आपको बता दें कि अब सरकारी माध्यमिक विद्यालयों में छात्राओं के लिए स्कूल परिसर में सेनेटरी नैपकिन की मशीनें लगाई जाएंगी। दरअसल छात्राएं इसके जरिए मुफ्त में सेनेटरी नैपकिन ले सकेंगी। यही नहीं छात्राओं के साथ साथ आसपास के गांवों की महिलाएं भी इस सुविधा का लाभ उठा सकेंगीं।

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आपको बता दें कि इसके लिए साल 2018-19 में 81.60 लाख रुपए की धनराशि आवंटित की गई है। यहां याद दिला दें कि समग्र शिक्षा अभियान के तहत ग्रामीण क्षेत्रों के दस राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक स्कूलों में सैनेटरी नैपकिन की मशीनें लगाई जानी हैं। दरअसल इस योजना पर काम भी शुरू हो गया है और अगले महीने से तय किए गए स्कूलों में मशीनों को लगवाने का काम शुरू कर दिया जाएगा।

कंपोस्ट प्लांट भी लगेगा स्कूलों में

मालूम हो कि जिन स्कूलों में सैनेटरी नैपकिन की मशीन लगेगी उनके साथ ही कंपोस्ट प्लांट भी लगाए जाएंगे, ताकि सेनेटरी नैपकिन का प्रयोग करने के बाद इधर-उधर फेंकने की बजाय सीधे प्लांट में डाला जाए। बता दें कि इसके साथ ही महिलाओं को व 10-19 साल तक की छात्राओं को इसे प्रयोग करने के लिए जागरूक किया जाएगा, ताकि वह बीमारियों से बच सकें।

35 करोड़ महिलाएं सिर्फ भारत में बनी इस बाजार का हिस्सा

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि रिसर्च फर्म एलायड मार्केट रिसर्च के मुताबिक वर्ष 2022 तक महिलाओं की महावारी से जुड़े बाजार का कारोबार आकार 42.7 अरब डॉलर का हो जाएगा। अकेले भारत में 35 करोड़ महिलाएं इस बाजार का हिस्सा बन चुकी है।

इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अभी मेट्रो जैसे शहरों में रहने वाली अधिकतर लड़कियों एवं महिलाओं को यह पता नहीं है कि इस कप का इस्तेमाल कैसे किया जाता है। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक प्लास्टिक पदार्थ से बने नैपकिन हेल्थ के लिए कई बार काफी खतरनाक हो जाते हैं और इससे कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी तक होने की आशंका रहती है।

आपको बता दें कि नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे यानी कि एनएफएचएस की एक रिपोर्ट के अनुसार, 15 से 24 वर्ष के उम्र की 58% महिलाएं लोकल एवं काम चलाऊ नेपकिन का इस्तेमाल करती हैं और जो कि बिमारी के संक्रमण से उनका बचाव कर पाने में सक्षम नहीं हैं। वहीं शहर की बात की जाए तो यहां भी 74% महिलाओं को ही हाइजेनिक नैपकिन उपलब्ध हो पाता है।

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