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चाणक्य नीति: धरती पर सबसे बड़े बोझ होते हैं ऐसे लोग

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हमारे शास्त्रों में हो ग्रंथों में कई सारे दोहे लिखे हैं। जिसे पढ़ने के बारे में व्यक्ति अपने मार्ग से कभी भी नहीं विचलित होता है। लेकिन कई बार हम सभी के जीवन में ऐसी स्थिति आ जाती है। जिसके कारण हम हार मान जाते हैं। हमारा मनोबल टूट जाता है। ऐसी स्थितियों में हमने अपने मन को मजबूत बनाकर रखना चाहिए और चाणक्य की नियमों को पढ़ना चाहिए। आज हम आपको बताते हैं कि कुछ ऐसे नियमों में जिसे पढ़ने के बाद आप कभी भी जीवन में हार नहीं मानेंगे।

मन मलीन खल तीर्थ ये, यदि सौ बार नहाहिं।

होयं शुध्द नहिं जिमि सुरा, बासन दीनेहु दाहिं।

चाणक्य के नियम का अर्थ है कि जिसके मन में पाप होता है। वह बाहर से कितना भी खुद को अच्छा बनाने की कोशिश कर ले खुद को साफ दिखाने की कोशिश कर ले। लेकिन वह कभी भी पूरी तरह से पवित्र नहीं होता है।

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धर्मशील गुण नाहिं जेहिं, नहिं विद्या तप दान।

मनुज रूप भुवि भार ते, विचरत मृग कर जान।

चाणक्य के नियम का अर्थ है कि जिस मनुष्य के अंदर ज्ञान गुण वह दया की भावना नहीं होती है। ऐसे लोग धरती पर बोझ के समान होते हैं। उन्हें इस धरती पर जीने का कोई भी हक नहीं होता है। ऐसे लोगों को जल्दी ही मर जाना चाहिए।

बिन विचार खर्चा करें, झगरे बिनहिं सहाय।

आतुर सब तिय में रहै, सोइ न बेगि नसाय।

चाणक्य अपने इस नियम में बताते हैं कि अगर कोई इंसान पैसे को व्यर्थ में खर्च कर रहा है। तो उसे शायद पैसे के महत्व के बारे में शायद नहीं पता। ऐसे व्यक्ति स्वभाव से काफी ज्यादा झगड़ालू होते हैं। और ऐसे व्यक्ति अपनी बीवियों को परेशान करने वाले होते हैं। ऐसे लोगों का कब नष्ट हो जाते है। उनको खुद भी इस बात का पता नहीं होता है।

दानशक्ति प्रिय बोलिबो, धीरज उचित विचार।

ये गुण सीखे ना मिलैं, स्वाभाविक हैं चार।

चाणक्य के नियम के मुताबिक मनुष्य के अंदर कुछ ऐसे गुण खुद से ही उत्पन्न होते हैं जैसे दान करना प्यारी प्यारी बातें करना लोगों की सेवा करना समय पर सही निर्णय लेना ऐसी बातें होती हैं जिन्हें किसी के द्वारा भी सिखाया नहीं जा सकता।

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