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चांद पर पानी की उम्मीद हो सकती है पूरी, जानिए चंद्रयान-2 के बारे में 10 अहम बातें

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भारत के एक बहुप्रतीक्षित मिशन चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग आज यानी कि सोमवार तड़के 2 बजकर 51 मिनट पर होनी थी लेकिन इस मिशन को तकनीकी कारणों से फिलहाल रोक दिया गया है। दरअसल तकनीकी खराबी की वजह से इसकी लॉन्चिंग को टाल कर दिया गया है और जल्द ही अब लॉन्चिंग की नई तारीख की घोषणा की जाएगी।

लेकिन फिर भी चंद्रयान-2 के बारे में 10 महत्वपूर्ण बातें आपको जरूर पता होनी चाहिए। चलिए जानते हैं इन बातों को..

आपको बता दें कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी कि ISRO ने पुष्टि करते हुए कहा कि ऐसी उम्मीद की जा रही है कि चंद्रमा की सतह पर पानी की खोज की जा सकती है। हालांकि इसके पहले हजारों बार इसका परीक्षण हो चुका है।

दरअसल इसरो की सबसे बड़ी चुनौती के तौर पर मिशन चंद्रयान-2 को माना जा रहा है। इसमें ऑर्बिटर (कक्षा), लैंडर (विक्रम), रोवर (प्रज्ञान) है। यह चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरेगा। आपको बता दें कि इसके पहले इस स्थान पर किसी अंतरिक्ष मिशन ने अपने सैटेलाइट नहीं उतारे हैं।

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मालूम हो कि चंद्रमा पर इस जगह में सौर उर्जा के लिए बड़ी मात्रा में सीधे तौर पर सूर्य का प्रकाश पड़ता है जिससे वहां पर दृश्यता काफी स्पष्ट है। यह बाकी स्थानों की तरह उबड़-खाबड़ नहीं बल्कि समतल है। यही कारण है कि यहां पर पानी और खनिज पदार्थ मिलने के आसार ज्यादा हैं।

यह भी ज्ञात हो कि मून पर लैंड करते ही चंद्रयान-2 की फर्स्ट लैंडिंग तस्वीर 15 मिनट के अंदर सामने आ जाएगी। हालांकि इसके लिए 4 घंटे का समय लगेगा।

आपको बता दें कि इसरो के इस मिशन में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा भी भारत का अहम रुप से साथ दे रहा है। जी हां, दरअसल इस मिशन में इस्तेमाल होने वाले लेसर LASER रैंगिंग के लिए नासा इंस्ट्रूमेंट का उपयोग किया जा रहा है। नेविगेशन और गाइडेंस के लिए भारत एक उचित कीमत पर नासा के डीप स्पेस नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहा है।

मालूम हो कि रोवर और लैंडर के पास एक लूनर डे यानी कि 14 दिन का समय होगा और इतने समय में इसे अपने वैज्ञानिक प्रयोग पूरे करने होंगे। वहीं ऑर्बिटर के पास 1 साल की क्षमता होती है।

आपको यह भी बता दें कि इस मिशन में वैज्ञानिक प्रयोग के लिए 13 इंडियन इंस्ट्रूमेंट का इस्तेमाल किया गया है। इसका इस्तेमाल वहां पाने जाने वाले मैग्नीशियम, कैल्शियम, और आयरन की तस्वीरें लेने के लिए किया जाएगा।

यही नहीं, इसके साथ ही वहां पाए जाने वाले पानी की तस्वीरें भी ली जा सकती हैं। चंद्रमा के बहिर्मंडल की स्टडी करने के लिए भी इस मिशन का इस्तेमाल किया जाएगा।

आपको याद दिला दें कि इसरो ने इसी तकनीक का प्रयोग मिशन चंद्रयान-1 के समय में भी किया था। हालांकि चंद्रयान-1 बस एक ऑर्बिटर था जबकि चंद्रयान-2 के पास लैंडर और रोवर कंपोनेंट्स भी हैं जिससे ये मिशन और भी जटिल हो जाएगा।

मालूम हो कि एक रोवर व्हील में एक अशोक चक्र होगा जबकि लैंडर में तिरंगे का इस्तेमाल होगा।

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