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नकली और मिलावटी सामान बनाने वालों की अब आएगी शामत, होगी 6 महीने से लेकर उम्र भर तक की जेल

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मिलावटी और नकली सामान बनाने वालों की अब खैर नहीं। जी हां, दरअसल अब ऐसे लोगों को 6 माह से लेकर 7 साल तक की जेल हो सकती है। जी हां, दरअसल सरकार ने उपभोक्ता संरक्षण बिल में यह प्रावधान किया है।

बता दें कि इस बिल को संसद के चालू सत्र में 2 दिन पहले लोकसभा में रखा गया है। दरअसल ऐसी उम्मीद की जा रही है कि चालू सत्र में यह बिल दोनों सदनों से पारित हो जाएगा। जानकारी के लिए बता दें कि जम्मू-कश्मीर को छोड़कर देश के सभी राज्यों में यह प्रस्तावित कानून मान्य होगा।

जानिए क्या है प्रस्तावित कानून

बता दें कि अगर मिलावटी और नकली सामान से उपभोक्ता को कोई नुकसान नहीं होता है तो सामान बनाने वाले को 6 माह की जेल और 1 लाख रुपए तक का जुर्माना हो सकता है।

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इसके अलावा अगर उपभोक्ता को उस मिलावटी सामान के इस्तेमाल से मामूली नुकसान होता है तो 1 साल की जेल और 3 लाख रुपए जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

मालूम हो कि नकली सामान के इस्तेमाल से उपभोक्ता को गंभीर नुकसान होता है तो निर्माता को सात साल की जेल और 5 लाख रुपए का जुर्माना होगा

बता दें कि अगर मिलावटी या नकली सामान के इस्तेमाल से उपभोक्ता की मौत हो जाती है तो सामान बनाने वाले को उम्रकैद की सजा भी मिल सकती है और कम से कम 10 लाख रुपए का जुर्माना होगा।

दरअसल इस प्रकार के मैन्यूफैक्चरर्स के लाइसेंस को भी रद्द करने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा बिना नुकसान वाली स्थिति में मैन्यूफैक्चरर्स के लाइसेंस को सस्पेंड किया जाएगा।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि उपभोक्ता की शिकायतों को सुनने के लिए एक सेंट्रल अथॉरिटी भी निर्माण किया जाएगा।

इसी प्रकार अगर कोई मैन्यूफैक्चरर्स अपने उत्पाद की बिक्री के लिए भ्रामक या तथ्य से हटकर विज्ञापन देता है तो भी मैन्यूफैक्चरर्स को जेल जाना होगा।

बता दें कि उपभोक्ता संरक्षण बिल के प्रावधान के मुताबिक अपने उत्पाद का भ्रामक विज्ञापन पहली बार देने पर मैन्यूफैक्चरर्स को 2 साल तक की कैद और 10 लाख रुपए का जुर्माना होगा।

मालूम हो कि इस प्रकार के भ्रामक विज्ञापन को फिर से देने पर मैन्यूफैक्चरर्स को 5 साल तक की कैद और 50 लाख रुपए तक का जुर्माना हो सकता है।

इसके अलावा उपभोक्ता की शिकायतों को सुनने के लिए एक सेंट्रल अथॉरिटी भी निर्माण किया जाएगा। खास बात यह है कि सेंट्रल अथॉरिटी के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में ही चुनौती दी जा सकेगी।

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