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अगर आप 10 साल तक नहीं करते हैं खाते में जमा पैसों का इस्तेमाल, तो बैंक कर देता उन्हें कहीं और ट्रांसफर

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देश के लगभग सभी बड़े वित्तीय संस्थानों में करोड़ों की अनक्लेम्ड राशि पड़ी हुई है. जी हां, इसकी जानकारी स्वयं केंद्र की मोदी सरकार ने संसद में दी. जी हां, दरअसल सरकार ने कहा है कि देश के विभिन्न वित्तीय संस्थानों के पास इस समय 32455.28 करोड़ रुपए लावारिस पड़े हैं और इनको लेने के लिए कोई दावा नहीं कर रहा है.

बता दें कि बैंकों में अनक्लेम्ड डिपॉजिट में पिछले साल 26.8% इजाफा हुआ. यह राशि 14,578 करोड़ रुपए पहुंच गई. इसीलिए आज हम आपको बैंक से जुड़ा एक खास नियम बताने जा रहे हैं. आपको बता दें कि लोकसभा में एक सवाल के जवाब में वित्त मंत्री ने बैंक में जमा अनक्लेम्ड डिपॉजिट्स को लेकर कई अहम बातें बताई हैं.

बैंक खाते का 10 साल तक नहीं किया इस्तेमाल

मालूम हो कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि बैंकों में अनक्लेम्ड डिपॉजिट्स को देखते हुए साल 2014 में आरबीआई ने डिपॉजिटर एजुकेशन एंड अवेयरनेस फंड (डीईएएफ) स्कीम शुरू की है.

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मालूम हो कि इसके तहत 10 साल या ज्यादा समय से निष्क्रिय पड़े सभी अनक्लेम्ड खातों में जमा राशि या वह रकम जिस पर 10 साल से किसी ने दावा नहीं किया है उसकी ब्याज के साथ गणना कर डीईएएफ में डाल दी जाती है.

अगर कोई ग्राहक निकालना चाहें तो

बता दें कि कोई ग्राहक अगर कभी दावा करता है तो बैंक ब्याज के साथ उसे भुगतान कर देते हैं. ऐसे में बैंक डीईएएफ से रिफंड का दावा करते हैं.

वित्त मंत्री ने बताया कि डीईएएफ में ट्रांसफर राशि पर पहले 4% ब्याज दिया जाता था. लेकिन 1 जुलाई 2018 से इसे 3.5% कर दिया गया. बता दें कि डीईएएफ की राशि का उपयोग जमाकर्ताओं के हितों को बढ़ावा देने और ऐसे ही दूसरे उद्देश्यों के लिए किया जाता है.

आखिर क्या है कानून

आपको बता दें कि बैंकों में पड़े अनक्लेम्ड डिपॉजिट की जहां तक बात है तो बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट 1949 में हुए संशोधन और इसी एक्ट के सेक्शन 26ए के इन्सर्शन के अनुरूप आरबीआई ने डिपॉजिटर एजुकेशन एंड अवेयरनेस फंड (DEAF) स्कीम 2014 को बनाया है.

दरअसल इस स्कीम के तहत बैंक 10 साल या उससे ज्यादा समय से ऑपरेट नहीं किए गए सभी अकाउंट में मौजूद क्यूमुलेटिव बैलेंस को उसके ब्याज के साथ कैलकुलेट करते हैं और उस अमाउंट को DEAF में ट्रांसफर कर देते हैं.

बता दें कि अगर DEAF में ट्रांसफर हो चुके अनक्लेम्ड डिपॉजिट का कस्टमर आ जाता है तो बैंक ब्याज के साथ कस्टमर को भुगतान कर देते हैं और DEAF से रिफंड के लिए दावा करते हैं.

दरअसल DEAF का इस्तेमाल डिपॉजिट के इंट्रेस्ट के प्रमोशन और इससे जुड़े अन्य आवश्यक उद्देश्यों के लिए होता है, जो कि आरबीआई सुझा सकता है.

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