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कालेधन पर सख्त हुई मोदी सरकार, देश-विदेश में कहां छुपा हुआ है कितना कालाधन, संसद में सरकार जारी करेगी रिपोर्ट

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5 जुलाई वो तारीख है जब देश का आम बजट आएगा. बता दें कि ये मोदी सरकार 2.0 के साथ साथ नई वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण का भी पहला बजट होगा. वैसे इस बार केंद्र सरकार 17वीं लोकसभा के इस बजट सत्र में काले धन पर रिपोर्ट पेश कर सकती है.

बता दें कि वित्त मामलों की स्थायी समिति ने इस बारे में अंतिम रिपोर्ट तैयार कर ली है. इसकी प्रारंभिक रिपोर्ट 28 मार्च को तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन को पेश की जा चुकी है. आपको बता दें कि इसकी कॉपी अब लोकसभा की वेबसाइट पर डाल दी गई है.

दरअसल साल 1990 से लेकर 2008 के बीच में कांग्रेस शासन के दौरान देश में आर्थ‍िक सुधारों के दौर में 9,41,837 करोड़ रुपए का काला धन बाहर भेजा गया. मालूम हो कि इस रिपोर्ट को नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस ऐंड पॉलिसी, नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लाइड इकोनॉमिक्स रिसर्च और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फाइनेंश‍ियल मैनेजमेंट की रिपोर्ट पर तैयार किया गया है.

रियल स्टेट सेक्टर में है सबसे ज्यादा काला धन

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आपको बता दें कि स्टैंडिंग कमिटी ऑन फाइनेंस की इस प्रारंभि‍क रिपोर्ट में कहा गया है कि वह सेक्टर जिनमें काला धन सबसे ज्यादा है वह है रियल स्टेट, माइनिंग, फार्मास्युटिकल्स, पान मसाला, गुटखा, टोबैको इंडस्ट्री, बुलियन और कमोडिटी मार्केट.

यही नहीं, इसके अलावा सबसे ज्यादा काला धन फिल्म इंडस्ट्री, एजुकेशनल इंस्टीट्यूट और प्रोफेशनल्स के द्वारा इस्तेमाल किया जाता है. साथ ही सिक्यूरिटी मार्केट और मैन्युफैक्चरिंग में भी काले धन की भरमार है.

मालूम हो कि देश भर में कितना काला धन है इसके बारे में कोई भी तर्कसंगत अनुमान नहीं है. दरअसल ऐसा भी कहा जाता है कि इसका अनुमान लगाने का तरीका अभी तक ढूंढा नहीं जा सका है.

हालांकि इन सबके बावजूद ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनामिक कोऑपरेशन ऐंड डेवलपमेंट ने मॉनिटरी मेथड, ग्लोबल इंडिकेटर मेथड, लेट एंड वेरिएबल मेथड का इस्तेमाल 2002 में काले धन की इस्तेमाल के लिए किया था. इन तीनों तरीकों के साथ साथ सर्वे बेस्ड मेथड का भी इस्तेमाल एनआइपीएफपी, एनआईएफएम और एनसीएईआर ने किया है.

GDP का 7 से 10% है काला धन

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि एनआईएफएम ने अलग-अलग तरीकों के आधार पर साल 2010-2011 में देश में काला धन जीडीपी का 7 से लेकर 10% होने का अनुमान लगाया है. दरअसल तीनों संस्थानों के अध्ययन से यह पाया गया कि देश के अंदर और बाहर काले धन के अनुमान को सही-सही लगा पाना कठिन है.

यही कारण है कि ऐसा कहा जा रहा है क्योंकि तीनों इंस्टीट्यूट के अनुमानों में काफी भिन्नता है. मालूम हो कि चीफ इकोनामिक एडवाइजर ने कमेटी को यह सुझाव दिया कि तीनों इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट को एक साथ रखकर साझा अनुमान भी नहीं दिया जा सकता है.

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