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देश में काफी फल-फूल रहा है जोंक से इलाज का कारोबार, ब्यूटी प्रोडक्ट्स के लिए किया जा रहा है इस्तेमाल

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नागपुर के उमेश बावणे ने अपनी अलग पहचान बनाई है। जी हां, दरअसल उमेश महाराष्ट्र के चिकित्सा क्षेत्र में काफी पॉपुलर हैं।इनकी तीन पुश्ते जोंक (लीच) की सप्लाई देश के कई डॉक्टरों को कर रही हैं। दरअसल उमेश के द्वारा सप्लाई किए जोंक से ये डॉक्टर कई पुरानी बीमारियों को ठीक कर रहे हैं। हालांकि उनका व्यापार भीषण गर्मी के कारण मंदा चल रहा है।

दरअसल उमेश बताते हैं कि हर साल अप्रैल, मई और जून में जोंक कम विकिसत होते हैं, क्योंकि इस दौरान गर्मी जबरदस्त होती है। अपने नाना सीताराम अटोणे से जोंक के रखरखाव और विकास का हुनर सीख चुके हैं, उमेश का बेटा अंकुश भी जोंक का रखरखाव करना जानता है।

बता दें कि उमेश के अनुसार आम तौर पर एक जोंक 100 रुपए का बेचते हैं और गर्मी के मौसम में एक जोंक कीमत दौ सौ से ढाई सौ रुपए तक पहुंच जाती है। उन्होंने बताया कि वह औसतन हर माह एक हजार जोंक बेच देते हैं। उनके अनुसार पूरे देश में मेरे जैसे करीब 100 सप्लायर हो सकते हैं और इसका हर माह एक करोड़ तक का धंधा हो सकता है।

100-200 रुपए में बेची जाती है एक जोंक

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कजोंक का व्यापार करने वाले उमेश बताते हैं कि करीब ढाई हजार डॉक्टरों को वो हर साल जोंक सप्लाई करते हैं। उनका कहना है कि हमारी तीन पीढ़ियां करीब पचास सालों से इस धंधे में हैं। उनके अनुसार करीब एक दशक पहले जोंक की कीमत में 7 गुना की बढ़ोतरी आई है।

उमेश के अनुसार एक दशक पहले एक जोंक 15 रुपए का बिकता था, अब यही जोंक 100-200 रुपए में बेची जाती हैं। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, गुजरात, समेत देश के एक दर्जन प्रदेशों मेंं जोंक से इलाज का काम चलता है। जोंक का रखरखाव कठिन है, और सबसे बड़ी चुनौती है सही जोंक को बेचना।

दरअसल जोंक दो तरह की होती है निर्विष और विषारी। निर्विष श्रेणी की जोंक हरे रंग की होती है जो इलाज में काम आती है, और विषारी श्रेणी की जोंक विषयुक्त होती है। यह नुकसानदायक होती है और हरे रंग छोड़कर कोई भी रंग में हो सकती है।

बता दें कि मध्य प्रदेश के बैतूल में जोंक से इलाज करने वाले डॉ आलोक वर्मा बताते हैं वे हफ्ते में एक दिन जोंक से इलाज करते हैं। इन्होंने बताया कि पुराने घाव, त्वचा संबंधी बीमारी, हार्ट ब्लॉकेज, खून और बालों संबंधी जैसे कई पुरानी बीमारियों का इलाज जोंक की मदद से किया जाता है।

उनके अनुसार लोगों को इससे आराम मिल रहा है, इसलिए वे अपने परिचितों को इसके बारे में बताते हैं। इसमें जोंक के रखरखाव पर ज्यादा ध्यान रखना पड़ता है। हर 3-4 दिन में पानी न बदलने से ये जोंक मर जाते हैं।

कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का भी है इलाज

मालूम हो कि चेन्नई की डॉ अनीता पटेल करीब दो दशक से जोंक के माध्यम से इलाज कर रही हैं। दरअसल इन्होंने बताया कि पहले 2 से 3 मरीज हफ्ते में आते थे, लेकिन अब हर रोज 4 से 5 मरीज आते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि इससे कैंसर जैसी बीमारी से जूझ रहे मरीज को भी आराम मिला है। दरअसल उन्होंने कहा कि इस पद्धति से कैंसर ठीक तो नहीं होता, लेकिन मरीजों को आराम जरूर मिल जाता है।

डॉ अनिता ने इसके रखरखाव के बारे में बताया कि एक जोंक को एक मरीज के लिए इस्तेमाल किया जाता है, दूसरे पर इसका इस्तेमाल नहीं किया जाता। इसके अलावा एक मरीज का एक जोंक से 10 बार ही इलाज किया जाता है। हर सिटिंग के बाद जोंक को हल्दी लगाकर उसके मुंह से गया मरीज का खून निकलवाया जाता है, और पानी बदल दिया है। इलाज पूरा होने के उस मरीज के जोंक को दोबारा इलाज में इस्तेमाल नहीं किया जाता है।

नहीं होता कोई साइड इफैक्ट

आपको बता दें कि राष्ट्रीय आयुर्वेद वि‌द्यापीठ के गुरु और नागपुर के डॉ गउकर आयुर्वेद धाम अस्पताल के संचालक डॉ धनराज गउकर ने बताया कि 5 हजार साल पहले आयुर्वेदिक में जलोकावारन पद्धति में जोंक से इलाज किया जाता है। इससे कई बार सर्जरी में इसका उपयोग किया जाता है। भगंदर का इलाज भी जोंक से किया जाता है। ये पूरा गंदा खून चूस लेता है।

इसके अलावा माईग्रेन और पैरासिस का इलाज भी इससे करते हैं। उन्होंने बताया कि युवक-युवती सौन्दर्य के लिए इस पद्धति से ईलाज आजकल खूब ले रहे हैं। जिन युवक-युवतियों की शादी होने वाली होती है और उनके चेहरे पर फोड़े, फुंसी और मुहांसे होते हैं, वे इस पद्धति से इलाज ले रहे हैं। इसकी सबसे खास बात यह है कि इससे किसी प्रकार का कोई साइड इफैक्ट नहीं है।

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