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मोदी सरकार है एक देश एक साथ इलेक्शन के लिए पूरी तरह से तैयार, लेकिन विपक्ष को है इससे दिक्कत

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भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है. यहां लगभग हर साल चुनाव, चुनावी रैली, और बार बार आचार संहिता, लगती रहती है. ऐसे में यही चुनाव न सिर्फ देश के विकास की राह में रोड़ा बन रहे हैं बल्कि राजनीति के लिए नेताओं में हो रही प्रतिस्पर्धा के कारण देश का माहौल भी बार-बार खराब कर रहे हैं. आपको याद हो कि पिछले साल मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान समेत 5 राज्यों के चुनाव हुए, तो उसके ठीक 5 महीने बाद देश में आम चुनावों का वक्त आ गया.

वहीं, इन आम चुनावों के साथ 4 राज्यों में विधानसभा चुनाव भी हुए. अब अभी केन्द्र और इन राज्यों में नई सरकार ने काम संभाला ही है तो झारखंड, हरियाणा और महाराष्ट्र में चुनावों का नंबर आ गया है. दरअसल इस तरह एक चुनाव खत्म हुआ नहीं कि दूसरा सिर पर आ जाता है. यही कारण है कि नरेंद्र मोदी स्वयं यही चाहते हैं कि देश में एक साथ एक ही बार चुनाव हों.

दरअसल प्रधानमंत्री कई मौकों पर कह चुके हैं कि एक राष्ट्र एक चुनाव से देश विकास के पथ पर तेजी से आगे बढ़ेगा. इसी सोच के साथ प्रधानमंत्री ने संसद परिसर में बुधवार को इस मसले पर सर्वदलीय बैठक बुलाई लेकिन सारे दल बैठक में शामिल नहीं हुए. जी हां, दरअसल इस बैठक से कांग्रेस, टीएमसी, टीडीपी, डीएमके और बीएसपी ने दूरी बनाए रखी.

आपको बता दें कि बैठक का बहिष्कार करने वाले दलों का मानना है कि सरकार की ओर से इस मुद्दे को उठाकर मूल मुद्दों से ध्यान भटकाया जा रहा है. जी हां, दरअसल बीएसपी प्रमुख मायावती ने ट्वीट कर कहा कि अगर ईवीएम के मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक होती तो वह इसमें जरूर शामिल होतीं.

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हालांकि एनडीए से बाहर भी कई दल एक राष्ट्र एक चुनाव के समर्थन में खड़े हैं. जी हां, बता दें कि इनमें नवीन पटनायक की बीजेडी और वाईएसआर कांग्रेस जैसे दल शामिल हैं. मालूम हो कि एक देश एक राष्ट्र की परिकल्पना को पीएम मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट भी कहा जा रहा है.

आपको याद दिला दें कि मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में नीति आयोग ने इस बारे में एक ड्राफ्ट भी तैयार किया था और विधि आयोग के साथ मिलकर इस काम के लिए चुनाव आयोग को नोडल एजेंसी बनाया गया था. दरअसल नीति आयोग का सुझाव था कि साल 2024 से एक राष्ट्र एक चुनाव की परिकल्पना साकार हो.

दरअसल आपको बता दें कि मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में इस मसले पर आमराय नहीं हो पाई थी और न ही चुनाव आयोग की इसके लिए तैयारियां पूरी थी. दरअसल इसलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बुधवार को बुलाई बैठक बेहद महत्वपूर्ण मानी गई है.

हालांकि विपक्ष के रुख ने ये साफ कर दिया है कि फिलहाल इस मसले पर आमराय नहीं है. लेकिन लेफ्ट पार्टियों और एनसीपी समेत कई विपक्षी दलों ने बैठक में शामिल होकर इस मामले में अपनी राय रखी. बता दें कि लेफ्ट पार्टियों ने पीएम मोदी की इस मुहिम का विरोध किया है.

दरअसल ऐसा माना जा रहा है कि विधायिकाओं का कार्यकाल निर्धारित करने के लिए संविधान में संशोधन किए बगैर एक राष्ट्र एक चुनाव की कल्पना को अमल में नहीं लाया जा सकता है. बता दें कि यही वजह है कि प्रधानमंत्री विपक्षी दलों से भी बात कर इस पर एक आमराय बनाने की कोशिश कर रहे हैं.

अब ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर कितना व्यावहारिक है एक देश एक चुनाव का नारा. दरअसल विपक्ष को इस पर क्या आपत्ति है और क्या वाकई में चुनावी फिजूल खर्ची पर लगाम लगेगी. अब सवाल ये भी कि आखिर सरकार के लिए विपक्षी दलों की आपत्तियों का काम करके आमराय बनाना कितना मुश्किल होगा.

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