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भगवान श्री गणेश का चमत्कारी मंदिर, जहां हर दिन बढ़ता जा रहा है उनकी मूर्ति आकार

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हिंदु मान्यताओं के मुताबिक भगवान गणेश का स्थान सर्वोपरि है। सभी देवी-देवताओं में गणेश जी की पूजा अर्चना सबसे पहले की जाती है। वैसे तो इनके कई रूप हैं और समूचे देश में गणपति के अनेक मंदिर हैं।

चूंकि गणेश जी भगवान हैं तो चमत्कार की बात न हो ऐसा तो हो नहीं सकता। दरअसल गणपति भगवान के चमत्कारों की कई कहानियां पुराणों में भी प्रसिद्ध हैं। हालांकि उनके कुछ चमत्कार आज भी देखे जा सकते हैं। जी हां, इन्हीं में एक चमत्कार चित्तूर का कनिपक्कम गणपति मंदिर भी है। जो कई कारणों से अपने आप में अनूठा और अद्भुत है।तो चलिए जानते हैं इसके बारे में।

दरअसल कनिपक्कम विनायक का ये मंदिर आंध्रप्रदेश के चित्तूर जिले में मौजूद है। बताया जाता है कि इसकी स्थापना 11वीं सदी में चोल राजा कुलोतुंग चोल प्रथम ने की थी।

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मान्यताओं की माने तो काफी साल पहले यहां तीन भाई रहा करते थे। इनमें एक अंधा, दूसरा गूंगा और तीसरा बहरा था। तीनों अपनी खेती के लिए कुआं खोद रहे थे कि उन्हें एक पत्थर दिखाई दिया। कहानी के मुताबिक कुएं को और गहरा खोदने के लिए जैसे ही पत्थर को हटाया गया वहां से खून की धारा निकलने लगी।

इसके बाद पूरे कुएं में लाल रंग का पानी भर गया लेकिन इसी के साथ एक चमत्कार भी हुआ। वहां पर गणेशजी की एक प्रतिमा उत्पन्न हुई जिसके दर्शन करते ही तीनों भाईयों की विकलांगता ठीक हो गई।

इसके बाद जल्दी ही यह बात पूरे गांव में फैल गई और दूर-दूर से लोग उस प्रतिमा के दर्शन के लिए आने लगे। फिर उस प्रतिमा को उसी स्थान पर स्थापित कर दिया गया।

बता दें कि यहां दर्शन करने वाले भक्तों का मानना है कि मंदिर में मौजूद मूर्ति का आकार हर दिन बढ़ता जा रहा है। कहा जाता है कि यहां मंदिर में एक भक्त ने भगवान गणेश के लिए एक कवच दिया था जो कुछ दिनों बाद छोटा होने के कारण प्रतिमा को नहीं पहनाया जा सका।

ये भी कहा जाता है कि प्रतिमा के बढ़ने का प्रमाण उनका पेट और घुटना है जो बड़ा आकार लेता जा रहा है। इतना ही नहीं एक और चमत्कार ये भी है कि सिर्फ मूर्ति ही नहीं बल्कि जिस नदी के बीचों बीच गणेश विराजमान हैं वो भी किसी चमत्कार से कम नहीं हैं।

दरअसल इस नदी की भी एक अनोखी कहानी है। कहते हैं संखा और लिखिता नाम के दो भाई थे। वो दोनों कनिपक्कम की यात्रा के लिए गए थे। चलते-चलते दोनों थक गए तभी लिखिता को जोर की भूख लगी और रास्ते में उसे आम का एक पेड़ दिखा तो उसको आम तोड़ने की इच्छा हुई। हालांकि उसके भाई संखा ने उसे ऐसा करने से रोका।

इसके बाद उसके भाई संखा ने उसकी शिकायत वहां की पंचायत में कर दी, जहां बतौर सजा उसके दोनों हाथ काट दिए गए।

लिखिता ने बाद में इसी नदी में अपने हाथ डाले थे, जिसके बाद उसके हाथ फिर से जुड़ गए। तभी से इस नदी का नाम बाहुदा रख दिया गया, जिसका मतलब होता है आम आदमी का हाथ।

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