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नवजात बालिका को पैदा होते ही फेंक गए झाड़ियों में, ऊपर से डाल दी कंटीली झाड़ियां, देखने वालों की कांप गई रूह

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एक बार फिर से नवजात बच्ची के संग वही हुआ जिसको दूर करने के लिए कई तरह के जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं पिछले कई सालों से लेकिन फिर भी लोग सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं। दरअसल मोकमपुरा गांव में शुक्रवार रात करीब दो से तीन बजे के बीच जन्मी नवजात बालिका को पैदा होते ही परिजनों ने कड़ाके की सर्दी में बिना कपड़े के जमीन पर लिटा कर ऊपर कंटीली झाड़ियां डाल दी और चले गए।

इसका पता तब चला जब सुबह सात बजे बच्चे स्कूल के लिए निकले। जी हां, जब बच्चे स्कूल के लिए जा रहे थे तब उसकी रोने की आवाज सुनकर रुक गए और इस बच्ची को गोद में उठा लिया।

कुछ ही देर में एम्बुलेंस और पुलिस आ गई। इसके बाद वे जब झांड़ियों के बीच पहुंचे तो देखा की पास ही खून का ढेर था।

पिछले 3 साल में मिले 13 नवजात

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बता दें की पिछले तीन साल में झाडिय़ों में नवजात को फेंक देने के 13 मामले सामने आए है। इसमें से 11 को बचाने में सफलता भी हासिल की है। लेकिब दो की जान भी गई है।

डिलेवरी भी यहीं हुई होगी

जिस झाडिय़ों के पास नवजात मिली है वहीं पे काफी बड़ी मात्रा में खून फैला हुआ था। इतना खून देखकर एम्बुलेंस के ईएमटी का कहना रहा कि यहीं खुले में महिला की डिलेवरी करवाई होगी। इतना खून डिलेवरी के दौरान ही निकलता है।

अनैतिक संबधों की है संभावना

देवल चौकी प्रभारी गिरीराजसिंह ने बताया कि मौके के हालात बता रहे है कि यह अनैतिक संबधों मामला हो सकता है। उनके मुताबिक इस तरह के मामलों में बदनामी से बचने के लिए अभिभावक गुपचुप डिलेवरी कराकर नवजात को फेंक देते है। हम इस पूरे क्षेत्र का सर्वे करेंगे। थाना प्रभारी ने ये भी कहा कि मां के खिलाफ अपने ही बच्चों को मारने का मामला दर्ज कर लिया गया है।

बच्ची का बचना है चमत्कार

इलाज कर रहे डॉक्टर का कहना है कि ठंड से नवजात का श्वसन तंत्र प्रभावित हो गया है जब बच्ची यहां लाई गई तब जन्म के करीब चार घंटे हो गए थे।

इसका मतलब ये हुआ कि उस वक़्त रात के 2 से 3 बजे होंगे जब इस बच्ची का जन्म हुआ होगा। उस वक्त तापमान 7 से 10 डिग्री के बीच था। बगैर कपड़ों के चार घंटे नवजात ने निकाले। यह जीवित आई, इस बारे में यहीं कहूंगा कि यह चमत्कार से कम नहीं है।

डॉक्टर ने कहा कि फिलहाल वार्मर में बच्ची को रखा है। सांस लेने में दिक्कतें है। ऑक्सीजन अभी भी चल रही है। पूरे मेडिकल के कॅरियर में ऐसा अब तक नहीं देखा। इसे कुदरत ने ही अब तक बचाकर रखा हुआ है।

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