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इस ऐप की मदद से अब बिना किसी सहारे के चल सकेंगे दृष्टिहीन लोग, इर्द-गिर्द की चीजों के बारे में बताएगा ऐप

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आंखों की रोशनी ना होना अपने आप में किसी चुनौती से कम नहीं है। ऐसे लोग जिंदगी भर हर कदम पर कठिनाइयों का सामना करते हैं। हालांकि उनमें से कुछ ऐसे भी होते हैं जो हालातों से हार नहीं मानते और कुछ अलग कर गुजरने की चाह भी रखते हैं। ऐसी ही एक मिसाल जापान की एक महिला ने पेश की है जिसकी आंखों की रोशनी नहीं है।

दरअसल जापान के टोक्यो शहर में एक ऐसा ऐप तैयार किया गया है जिससे ब्लाइंड लोग बिना किसी सहारे के चल फिर लेंगे। इस एप की सबसे खास बात यह है कि इस ऐप को तैयार एक ऐसी महिला ने किया है जो खुद देख नहीं सकती है। यानी की ये कहना गलत नहीं होगा उनसे बेहतर दृष्टिहीन लोगो की समस्या को और कौन समझ सकता था।

जी हां, ये सच है। इस महिला का नाम चिएको असाकावा है और चिएको इन दिनों आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के जरिए दृष्टिहीनों का जीवन बदलने की कोशिश करने का प्रयास कर रही हैं। उन्होंने नव-कॉग नाम से ऐप बनाया है। यह आवाज से कंट्रोल होने वाला स्मार्टफोन ऐप है।

इसकी मदद से दृष्टिहीन किसी बिल्डिंग के भीतर चल सकते हैं। इसे जल्द ही डेवलप कर लॉन्च कर दिया जाएगा। इसका पायलट प्रोजेक्ट 2020 में टोक्यो में शुरू होगा।

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दरअसल असाकावा की 14 साल की उम्र में एक दुर्घटना में आंखों की रोशनी चली गई थी। इसके बाद उनका कहीं आना-जाना, पढ़ना-लिखना सब मुश्किल हो गया था। उन्होंने बड़ी मुश्किल से कंप्यूटर साइंस में पढ़ाई की।

वैसे आपको जानके ये आश्चर्य होगा की दृष्टिहीन होने के बावजूद असाकावा ने पीएचडी की। वर्तमान में वह आईबीएम में फेलो और कार्नेगी मेलॉन यूनिवर्सिटी की फैकल्टी मेंबर हैं।

आज असाकावा की उम्र 60 साल है और अब उन्होंने एक ऐसा एप बना दिया है जिससे दृष्टिहीन कहीं भी, किसी भी जगह आसानी से आ-जा पाएंगे।

ऐसे करेगी दृष्टिहीनों की मदद

पैदल चलने के दौरान ये ऐप दृष्टिहीन लोगों के इर्द-गिर्द आने वाली चीजों के बारे में बताता रहेगा। मान लीजिए आप ऐसी जगह जाते हैं जहां साइन बोर्ड या रेस्तरां में मेन्यू नहीं पढ़ सकते, तो वहां यह आपकी मदद करेगा। असाकावा का दावा है, एआई यानि की आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के कारण आज से 30 साल बाद दिव्यांगता लोगों के लिए समस्या कम हो जाएगी।

पहले भी कर चुकी हैं दृष्टिहीन लोगों के लिए काम

बता दें कि असाकावा पहले भी ऐसे लोगो की मदद कर चुकी है जिनकी दृष्टि नहीं है। दरअसल असाकावा ने डिजिटल ब्रेल तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। उन्होंने 1990 के दशक में वॉयस ब्राउजर विकसित किया था जिससे दृष्टिहीनों के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल काफी आसान हो गया है।

प्रोजेक्ट की हो रही काफी तारीफ

दरअसल दृष्टिहीनों की मदद करने वाले इस ऐप को चलाने के लिए बिल्डिंग में 10-10 मीटर की दूरी पर ब्लूटूथ सिग्नल छोड़ने वाले बीकन लगाए जाते हैं। इसकी वजह से बिल्डिंग के भीतर जगह की मैपिंग होती है।

जानकारी के लिए बता दें कि अभी अमेरिका के कई शहरों और जापान की राजधानी टोक्यो में नव-कॉग की टेस्टिंग चल रही है। असाकावा कहती हैं, हो सकता है इस एप से दृष्टिहीनों की समस्या पूरी तरह खत्म ना हो, लेकिन यह उनके लिए काफी मददगार होगा।

आपको मालूम हो की पायलट प्रोजेक्ट में जो लोग एप का इस्तेमाल कर रहे हैं उन्होंने इसे काफी सराहा है। नई जगहों पर भी उन्हें चलने-फिरने में आसानी होती है। और उनका ये मानना है कि आने वाले समय में ये ऐप किसी क्रांति से कम साबित नहीं होगी।

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