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इस नई टेक्नोलॉजी के जरिए कच्ची मिट्टी में 48 घंटे में तैयार हो रही है पक्की सड़क

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आपकी जानकारी के लिए बता दें कि गीली मिट्टी में सीमेंट के साथ एडिटिव केमिकल डालकर उस पर रोलर चलाने के कुछ घंटों के भीतर ही पक्की सड़क बनकर तैयार हो जाती है. जी हां इस बेहतरीन टेक्नोलॉजी का उपयोग कर रांची के बीजूपाडा से बरहे तक सड़क बनाई जा रही हैं. वही आपको बता दें कि झारखंड में पहली बार पायलट प्रोजेक्ट के अंतर्गत इसे शुरू किया गया है. अगर यह प्रयोग सफल हो जाता है तो पूरे राज्य में इसी तकनीक के जरिए सड़के बनाई जाएंगी. दरअसल इस तकनीक की खासियत यह है कि अब सड़क बनाने के लिए सड़क पर बोल्डर बिछाने, मोरम डालने आदि की कोई भी आवश्यकता नहीं होगी. बस मिट्टी को सबसे पहले समतल किया, उसमें केमिकल डाला और पत्थर से भी मजबूत सड़क बनकर तैयार हो जाएगी. दरअसल यह सब जानकारी हॉलेंड से रांची आए टेनाची इंजीनियर के डायरेक्टर मार्को कोर्ट लिवर ने दी है.

वही मार्को ने आगे कहा कि इसके लिए जर्मनी से भी मशीनों को मंगाया गया है. जबकि इस तकनीक में उपयोग होने वाला पीले रंग का पाउडर स्टैक टैक्स आयरलैंड से इंपोर्ट किया जाता है. इसे सिंथेटिक्स, जिओलाइट और अर्थमेटल मिक्स कर बनाया जाता है. इस पाउडर की मदद से ही आधुनिक तरीके से सड़कों को बनाया जाता है. इसमें बेस कोर्स मटेरियल की आवश्यकता नहीं होती. जर्मनी से वर्टगन 240 मशीनों को भी मंगाया गया है. जोकि सीमेंट और स्टैक टैक्स का आपस में मिश्रण कर देती है. यह मशीनें पूर्णता कंप्यूटरराइज्ड हैं और जरूरत के हिसाब से ही यह उस गीली मिट्टी में सीमेंट, स्टैक टैक्स और पानी को डालती हैं. वाइब्रेटी रोलर की मदद के जरिए इसे रोल कर दिया जाता है जिससे कि 48 घंटे के अंदर ही ट्रैक स्टेब बनकर तैयार हो जाता है.

आपको बता दें कि इस तकनीक से तैयार किए गए ट्रक इतना समतल होता है कि गाड़ियों के पहिए फिसलने का डर जरूर बना रहता है. इसी वजह से 72 घंटे के अंदर ही इस पर अलकतरा चढ़ा दिया जाता है. वही आपको यह भी बता दें कि इस तकनीक से बनाई गई सड़कों में कम से कम 10 साल तक कोई भी गड्ढा नहीं हो सकता है. यह नई टेक्नोलॉजी सड़क बनाने की पुरानी टेक्नोलॉजी के मुकाबले 25 फ़ीसदी सस्ती होगी. इसी बात को देखते हुए केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्रालय ने इस नई टेक्नोलॉजी को परमिशन दी है. इसी के आधार पर झारखंड में पहली बार इस टेक्नोलॉजी का उपयोग किया जा रहा है. आपको यह भी बता दें कि दुनिया के करीब 20 देशों में इसी तकनीक का उपयोग कर सड़क बनाई जाती हैं.

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